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गोवर्धन पूजा से होती है सुख और सौभाग्‍य में वृद्धि

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क्‍या आप जानते हैं कि गोवर्धन पूजा क्‍यों मनाई जाती है? इस दिन ऐसा क्‍या हुआ था, जिससे देवराज इंद्र का घमंड टूटा और गोवर्धन पर्वत भगवान के रुप में पूजा जाने लगा।

पंचदिवसीय दीपावली के अंतर्गत कांर्तिक शुक्‍ल एकम तिथि को प्रतिवर्ष गोवर्धन मनाया जाता है। दरअसल, इसी दिन श्रीकृष्ण ने पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाकर देवराज इंद्र का घमंड तोड़ा था। इसीलिए इस दिन पर्वतराज गोवर्धन की पूजा के साथ-साथ मंदिरों में अन्नकूटा जाता है। घरों में इस दिन गोबर से गोबर्धन बनाया जाता है। यह मनुष्‍याकार होता है। इसके बाद उसको फूलों,कांटों, पत्तियों और डालियों से आच्‍छादित किया जाता है। खुले आसामान के नीचे बनाए गोवर्धन की सूर्यास्‍त के समय धूप, दीप, जल, फल, खील, बताशे से पूजन किया जाता है।

विधि विधान के साथ पूजा करने के बाद सभी एक साथ मिलकर पर्वतराज गोवर्धनजी की परिक्रमा करते हैं। “गोवर्धन जी की जय” बोलते हुए कुल सात बार उनकी परिक्रमा की जाती है और हर बार जयकारा लगाया जाता है। इस परिक्रमा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि परिक्रमा करने वाली मंडली में से एक व्‍यक्ति अपने हाथ में पानी से भरा लोटा और दूसरे हाथ में खील लेकर चलता है।

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार गोवर्धन गिरि भगवान के रूप में पूजे जाते हैं। सदियों से यह मान्‍यता चली आई है कि इस दिन घर-परिवार में गोवर्धन पूजा करने से सुख और सौभाग्‍य में वृद्धि होती है। मशीनरी का काम करने वाले लोग भगवान विश्‍वकर्मा की पूजा भी इसी दिन करते हैं।

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